रानो और रफ़ीक
नवाब मिर्ज़ा और दादा जी में दांत काटी दोस्ती थी। बहस भी खूब होती पर एक दूसरे की उठती गिरती पलक का हाल बिन कहे दोनों ही समझ जाते। बेगम साहिब बड़ी नफ़ासत पसंद तबियत की मल्लिका थीं। दादी से उनकी दोस्ती बहनापे की थी। दुपहरी एक दूसरे के घर कटती थी दोनों की। एक से बढ़कर एक क्रोशिया की कारीगरी होती। थालपोश , मेज़पोश, शृंगार मेज के कवर, कोस्टर कवर , ख़ूबसूरत लेस बुनी जातीं। भरवाँ कढ़ाई के बूटे काढ़े जाते। धागों के रंगों की मैचिंग का हंगामा अलग ही लुत्फ़ देता था। चिप्स, पापड़, कचरी, मूँगौड़ी, वड़ी सब इसी दुपहरी में बनता। कारख़ाना खुल जाता और बोरा भर आलू दो दिन में तमाम हो जाता।
नवाब मिर्ज़ा और बेगम साहिबा की दरगाहों पर मन्नतों की दुआ से एक बेटा था जिन्हें रफ़ीक नाम से नवाज़ा गया था। माशाअल्लाह ख़ूबसूरत, लंबे, गोरे चिट्टे , ज़हीन इंसान थे। हम उन्हें रफ़ीक चचा कहते और अक्सर अपनी उजड्डता के लिए टिपियाये जाते। हमारी मंझली बुआ उनकी हमउम्र थीं। बचपन से साथ खड़िया पट्टी लेकर पंडित जी पाठशाला में ककहरा सीखने जाते। उनका बड़ा रौब हुआ करता था। बुआ पर हुकूम खूब चलाते। बेचारी रानो बुआ उनके खफ़ा हो जाने से बड़ा खौफ़ खाती थीं। कक्षा आठ के बाद दोनों की राहें जुदा हो गईं। अब रानो बुआ लड़कियों की कन्या पाठशाला में और रफ़ीक चचा हॉस्टल चले गए।
रफ़ीक चचा जब गर्मी और सर्दी की छुट्टी में घर आते तो उनकी अड्डेबाजी हमारे घर में छोटके चाचा के कमरे में खूब होती। शामत हम बच्चों की आ जाती। नाश्ता, खाना सब जीना चढ़कर छोटके चाचा के कमरे में ले जाना पड़ता। चाय के तो इतने दौर चलते कि हम सभी घबरा कर जीना चढ़ने-उतरने की कसरत से बचने के पीछे दोहर ओढ़ कर सो जाते। रानो बुआ फरमाबरदारी से चाय,कॉफी , नाश्ता, फल सब ऊपर पहुँचाती रहतीं।
गर्मी की छुट्टी के बाद रफ़ीक चचा हॉस्टल वापस चले गए। नवरात्र आने वाले थे। फलाहारी चिप्स, पापड़ सब सरियाये जाने लगे। कूटू का आटा हमेशा बेगम साहिबा अपनी निगरानी में चकिया पर पिसवा कर भेजतीं। इस बार घर में कुछ अलग ही रौनक थी। रानो बुआ का रिश्ता तय हो गया था। होने वाले फूफा जौनपुर के थे। अब मौके-बेमौके ढोलक बजती और महराजिन चाची लहक कर गातीं ....
" हरियाला बन्ना जौनपुरिया
खरबूजे में धर कर लै आया तगड़ी "
रानो बुआ बड़ा खीझतीं। आती जाती भौजाइयाँ ठिठोली करतीं और खरबूजा न भूलने देतीं।
रानो बुआ का ब्याह आ गया। बेग़म साहिबा ने नौरत्न का भारी सेट पीली बनारसी साड़ी जिसका हरा बॉर्डर था अपने हाथों से रानो बुआ को दीं। नवाब साहब और बेगम साहिबा सगे भाई- भाभी के तौर पर हर रस्म, हर जगह उपस्थित रहे। दशहरे वाले दिन ब्याह कर रानो बुआ ससुराल गयीं। बिदाई में इतना रोईं कि लगा डोली से उतार ली जायेंगीं।
रानो बुआ अपने घर की इकलौती बहू थीं सो मान दान बहुत था। मायके आना कम ही होता पर जब आतीं तो घर हँसी ठठ्ठे से गूँज उठता। अब रफ़ीक चचा बहुत कम आते। वे इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर कुछ उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी चले गए जहाँ से पूरे तीन साल बाद लौटे।
बेगम साहिबा चचा के सिर पर सेहरा सजा देखने की आस लिए राह देख रही थीं। सुनते हैं लड़की भी उनकी नज़र में थी। अम्माँ और दादी एक दिन शाम को उनकी हवेली पर गयीं। हम लोग हैरान थे कि ये बेमौसम बरसात कैसी, पर छोटे थे सो खेल में लग गए। रात खाने के बाद बेगम साहिबा के घर की बालूशाही खाने को दी गईं। तब पता चला रफ़ीक चचा की मँगनी हो गयी। दुल्हन बेहद ख़ूबसूरत हैं। उतरती सर्दी में ब्याह होगा।
दिन कम ही थे। रोज रात गाने बजाने की महफ़िल हवेली पर सजने लगी। दिन भर कभी दर्जी, कभी पर्दे वाला, कभी झालर वाला आते जाते रहते। रौनक ही रौनक थी। घर में दर्जी तमाम सिलाई मशीन सजाये सबके कपड़े सिल रहे थे। हर वक़्त गोटा किनारी, सितारे, बुक्का , किरन लशकारे मार रहे थे। बावर्चीखाना कब बन्द होता था पता ही नहीं चलता था। एक बात जरूर होती कि बिना किसी नागे के गरीबों के लिये देग अलग पकती जो उन्हीं के नाम पर रिजर्व रहती और उन्हें भरपेट भोजन करवाया जाता।
एक दुपहरी बड़ी आमद दरफ़्त थी। बड़े लोग हम बच्चों को घर में महराजिन चाची और पंडित देवतादीन के सहारे छोड़कर चले गए। शाम तक तमाम रिश्तेदार आने लगे। हमें लगा रफ़ीक चचा का ब्याह पक्का आ गया। बस ये नहीं समझ आ रहा था कि आने वाले मुस्कुरा क्यों नहीं रहे क्योंकि तमाम रिश्तेदारान अपनी हँसी और ठिठोली के लिए प्रसिद्ध थे।
अगली सुबह हमें जल्दी जगाया गया और दूध और बिस्कुट देकर तैयार हो जाने को कहा गया। हिदायतें पचासों मिल रही थीं। शोर नहीं करना। एकदम चुपचाप महराजिन चाची के पास बैठना। खाने को कुछ नहीं मांगना।
हमें हवेली ले जाया गया। हम हैरान और सहमे हुए थे। बीचोबीच आँगन के कोई फर्श पर लेटा था। सफ़ेद चादर ओढ़ी थी। हम लोग कोने में दुबक कर बैठ गए। बहुत भीड़ थी। लोग रो रहे थे।
अचानक बहुत हलचल हुई। देखा रानो बुआ और फूफा जी आये हैं।रानो बुआ को अम्माँ फर्श पर सो रहे इंसान के पास लाईं। रानो बुआ एकटक चादर देखे जा रही थीं। चुप और बदहवास थीं।
अचानक रानो बुआ गिर गईं और बड़े जोर का चीखीं ...
रफ़ीक मियाँ तुम ब्याहे गए ......
रोचक संस्मरण ।
ReplyDeleteओह! कहानी का अंत भावुक कर गया।
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