इतिहास दोहराता है ...

मेरे एक सहयोगी रविप्रकाश थे। छोटा सा सुखी परिवार था। एक तीन वर्ष का बेटा और एक चार महीने की बिटिया। पत्नी ठेठ ग्रामीण परिवेश से थी किन्तु बारहवीं तक पढ़ी थी और घरेलू कामकाज में कुशल थीं। वे कार्यालय में लिपिक के पद पर थे। संस्था का काला-सफेद जानते थे। आर्थिक विपन्नता नहीं थी किन्तु ऐसा भी नहीं था कि ऐशोआराम के साधन में से कोई एक ही ले पाते। हँसमुख थे और परोपकारी तो परम के थे। रुपयों से सहायता करने में सक्षम नहीं थे इसलिए परिश्रम दान करते।

संस्था में कुछ बड़ा आयोजन होने वाला था। एक्स्ट्रा ड्यूटी सभी को करनी पड़ रही थी। कई बार घर पहुँचने में ग्यारह भी बज जाते। शनिवार को तय हुआ कि कल इतवार को दोपहर दो बजे से आयेंगें। अगले दिन हम लोग दो बजे पहुँचे तो देखा बड़ी अफरा-तफरी मची है। पता चला रविप्रकाश जी घर पहुँचे ही नहीं। सुबह से सब जगह उन्हें तलाशा जा रहा है। उनकी पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल था। उन्हें पुलिस ने भी बहुत तलाशा किन्तु कोई पता नहीं चला। मोबाइल उन दिनों होते नहीं थे। उनके गायब होने की कोई वज़ह किसी को नहीं पता। हैरान हैं सब।

वक़्त गुज़रता गया। उनकी पत्नी को संस्था ने बीटीसी करवाया। बाद में उन्होंने बीए, बीएड भी किया। नर्सरी और केजी के बच्चों को विद्यालय में पढ़ाने लगीं। जब भी मौका मिलता पति को तलाशने भटकने लगती। शहर में वो लोग किराए के मकान में रहते थे। मकान मालिक से हाथ-पैर जोड़कर वहीं रहती रहीं क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि गुड़िया के पापा जब आयेंगें तो यही घर का पता उन्हें बच्चों तक पहुँचा देगा। .... किन्तु रविप्रकाश नहीं आये।

बेटा किसी बड़ी कंपनी में उच्च श्रेणी का पदाधिकारी हो गया। उसका विवाह हो गया। साल भीतर प्यारा सा पोता आ गया। गुड़िया ने एमएससी कर ली और रिसर्च करके लेक्चरर हो गयी। गुड़िया के लिए वर ढूंढा जाने लगा। सारी बात तय हो जाती किन्तु पिता के परिचय को पाते ही लोग पीछे हट जाते। अंततः गुड़िया का विवाह हुआ किन्तु बेमेल। माँ की अपार पीड़ा और अथक परिश्रम के अहसास ने गुड़िया को ससुराल में नर्क भी स्वर्ग बना दिया। विवाह के तीन वर्षों में गुड़िया तीन कन्याओं की माँ बन अपराधिनी का जीवन जीती रही। पोते के बाद दो जुड़वा पोतियाँ आईं। .... बस नहीं आये तो रविप्रकाश। 

पोता पाँच वर्ष , पोतियाँ तीन वर्ष और गुड़िया की सबसे छोटी पुत्री दो वर्ष की हो गयी। बच्चों की हँसी सुनवाने के लिए रविप्रकाश की तलाश कुछ ज्यादा ही तेज कर दी गयी। जिसने जहाँ बताया वे वहाँ अकेली कठिन सफर करके भी भागती रहीं। 

कुछ दिन पूर्व हालचाल जानने को फोन किया तो पता चला रविप्रकाश तो नहीं आये उल्टे उनका बेटा पिछले एक माह से लापता है ............। कारण फिर से किसी को नहीं मालूम। सभी स्तब्ध हैं। 

इतिहास दोहरा गया ... तीन वर्ष की मासूम बेटियाँ हर वक़्त पापा-पापा आवाज़ देती हैं और उत्तर न मिलने पर फूट-फूटकर रोती हैं .......।

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