भाभोजी बाऊजी

जोगिंदर चाचाजी के बाऊ जी और बेबे जी विभाजन की बेशुमार तकलीफें झेल कर किसी तरह सात बच्चों को लेकर आये थे। कैम्प में किसी तरह शरण मिली। 



बाऊजी उधर जगीरदार थे पर इधर एक मुट्ठी अन्न को भी भारी थे। अपना न सही पर परिवार का तो पेट पालना ही था सो झल्लीदार का काम करने लगे। इक्कनी दुअन्नी मुश्किल से मिलती। झिड़कियाँ अलग से सुनने को मिलती। यह आमदनी इतनी न थी कि एक वक्त की रोटी ही नमक संग नसीब हो जाये। 



बेबेजी हुनरमंद थीं। वे कालोनियों में जा कर हाथ पैर जोड़कर दो चार घरों से चावल की कचरी और पापड़ बनाने का काम ले आईं। लोगों को पसंद आया और घरों में इज़ाफ़ा हुआ। बेबेजी छः गिलास चावल, दाल या मैदा लेतीं। पूरी ईमानदारी से पाँच गिलास का कचरी, पापड़, मंगौड़ी, बड़ियाँ बनाकर दे आतीं। रूपया पैसा उन्होंने कभी नहीं मांगा। जो खुश होकर कोठी वालियाँ दे देतीं वे दामन फैला कर ऊपरवाले का शुकराना अदा करते हुए सिर झुकाए ले लेतीं। 

गुजारा इतने में भी बड़ा कठिन था। कई बार बेबेजी नकली रोटी खाने का दिखावा करतीं और पानी में नमक घोलकर पी कर सो जातीं। 

बेबेजी को सिलाई कढ़ाई क्रोशिया का काम भी आता था। वे कोठियों से पेटीकोट , जम्पर, सलवार आदि सिलने को ले आतीं। सिलाई मशीन किसी कोठी वाली ने उन्हें इस शर्त पर मुफ्त दे दी कि वे जीवन भर उनके कपड़े मुफ्त सिलेंगीं। नाजुक सी लेस क्रोशिया से बुनती, गिलाफ पर बूटे काढ़तीं , पेटीकोट की लेस बुनती और टांकतीं। मेहनताने को कभी अपने मुँह से नहीं कहा उन्होंने। जो भी बेगमें , मलकिनें दे देतीं वे ले लेतीं।

रात दो से तीन घण्टे की नींद में सिमट गई पर बच्चों के पेट दोनों वक़्त भरने लगे।

अब फ़िक्र बच्चों की पढ़ाई की थी। फीस देने जितनी आमदनी न थी। कैम्प में ही कुछ पढ़े लिखे लोग बच्चों को अक्षर ज्ञान करवाने लगे। 

बाऊजी ने कुछ समय बाद शाम को बाजार के बाद गली-गली फेरी लगाकर तरकारी बेचना भी शुरू कर दिया। इससे जो पैसे आते वे उन्हें बच्चों की फीस देने की सोचने लगे।

बाऊ जी और बेबे जी ने मेहनत में कोई कोताही नहीं की। बच्चे मामूली स्कूल में जाने लगे। बड़े हुए और अपनी-अपनी ज़िंदगी में जा बसे। 

जोगिंदर चाचा जी भाई बहनों में सबसे छोटे थे। अपनी पहली कमाई से जो उन्हें किसी कम्पनी के क्लर्क होने से पाई एक छोटी सी खोली खरीद कर बेबेजी को दी। वे तीनों उसी खोली में बहुत सालों तक रहते थे।

जोगिंदर चाचा जी ने नौकरी के साथ देर रात तक जागकर पढ़ाई की। शाम को बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया। जो भी आमदनी होती बाऊजी को दे देते। 

बाऊजी ने उनके रुपये जोड़े। उन रुपयों से दो कमरे का मकान बनवाया और तब जोगिंदर चाचा जी का ब्याह हुआ।

जोगिंदर चाचाजी के चार बेटे और एक बेटी थे जिसमें बेटी सबसे छोटी और मन्नतों वाली थी। चाचा जी ने बेटी के जन्म पर कपड़ों का छोटा सा व्यापार शुरू किया जो अपनी सच्चाई और मेहनत से बड़ी दुकान में बदली।

जोगिंदर चाचाजी ने छः मंजिला बहुत बड़ी कोठी बनवाई। हर मंजिल का एक सा नक्शा रखा। पाँच कमरे, रसोई और बड़े हाल से सजी थी हर मंजिल। वे अपने एकदम बूढ़े हो चुके बाऊजी और भाभो जी  की सेवा खुद करते। 

बाऊजी और भाभो जी उम्र पूरी कर साथ छोड़ गए। बच्चे बड़े हो गए। हर बच्चे की कोठी में अपनी मंज़िल थी। सबसे ऊपर वाली मंजिल बेटी के नाम थी। बाऊजी को लगता बेटी जब मायके आये उसे किसी परजाई के कमरे में न रहना पड़े। 

बेटों ने व्यापार संभालने की जगह नौकरी करना उचित समझा औ वे दूसरे शहर चले गए। बेटी को पास के शहर में इसलिए ब्याहा गया कि जब मन करेगा मिल लिया जायेगाकिन्तु जमाई विदेश गए और वहीं के हो गए।

अब जोगिंदर चाचा जी अपनी लकवाग्रस्त पत्नी के साथ कोठी की सबसे निचली मंजिल पर रहते हैं। ऊपर की मंजिलें सांस लेने को तरस रही हैं।

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