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Showing posts from June, 2020

भाभोजी बाऊजी

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जोगिंदर चाचाजी के बाऊ जी और बेबे जी विभाजन की बेशुमार तकलीफें झेल कर किसी तरह सात बच्चों को लेकर आये थे। कैम्प में किसी तरह शरण मिली।  बाऊजी उधर जगीरदार थे पर इधर एक मुट्ठी अन्न को भी भारी थे। अपना न सही पर परिवार का तो पेट पालना ही था सो झल्लीदार का काम करने लगे। इक्कनी दुअन्नी मुश्किल से मिलती। झिड़कियाँ अलग से सुनने को मिलती। यह आमदनी इतनी न थी कि एक वक्त की रोटी ही नमक संग नसीब हो जाये।  बेबेजी हुनरमंद थीं। वे कालोनियों में जा कर हाथ पैर जोड़कर दो चार घरों से चावल की कचरी और पापड़ बनाने का काम ले आईं। लोगों को पसंद आया और घरों में इज़ाफ़ा हुआ। बेबेजी छः गिलास चावल, दाल या मैदा लेतीं। पूरी ईमानदारी से पाँच गिलास का कचरी, पापड़, मंगौड़ी, बड़ियाँ बनाकर दे आतीं। रूपया पैसा उन्होंने कभी नहीं मांगा। जो खुश होकर कोठी वालियाँ दे देतीं वे दामन फैला कर ऊपरवाले का शुकराना अदा करते हुए सिर झुकाए ले लेतीं।  गुजारा इतने में भी बड़ा कठिन था। कई बार बेबेजी नकली रोटी खाने का दिखावा करतीं और पानी में नमक घोलकर पी कर सो जातीं।  बेबेजी को सिलाई कढ़ाई क्रोशिया का काम भी आता था। वे कोठियों से प...

भूत लीला

बचपन में भूत के नाम से मैं डर के मारे बेवक्त सो जाती थी।  फिर कॉलेज के हॉस्टल में रह कर वह डर अपने आप गायब हो गया।  हम रोवर से फ्रैंकी मँगवाते और उससे टॉर्च को तीन बार जलाने-बुझाने का सिग्नल बाउंड्री वाल के गेट नम्बर दो की झिर्री से देने को कहते। चार लड़कियाँ बरामदे में वॉक करने के बहाने टहलते रहते। बाउंड्री के आखिरी कोने में अँधेरा रहता था और वह कोना सिस्टर की नज़र में भी नहीं आता था, यह बात हमें मालूम थी। सिग्नल आने पर कोई एक लड़की दबे पांव जाती और पैकेट ले आती। दीवार में एक छेद था जिससे हाथ आराम से आरपार चला जाता और पैकेट भी मजे में निकल आता।  रोवर का बन्दा उसी कोने से हमें पैकेट पकड़ाता और पेमेंट ले जाता। वैसे हम लोग रोवर में एकाउंट भी सेट किये हुए थे कि जब पैसे की तंगी होगी तो पेमेंट नहीं देंगें, पाँच तारीख के बाद आकर एक साथ हिसाब चुकता करेंगें। काफी समय तक सब अच्छी तरह चलता रहा। एक रात पैकेट आने में देर हो गयी। सर्दी इतनी कि हड्डियाँ गल रही थीं। इंतज़ार लंबा था। ग्यारह बज गए थे। कुछ गुस्सा भी था कि ठंड से मरे जा रहे हैं और ऊपर से भूखे भी रहना पड़ेगा। फ्रैंकी की भूख लगती भ...

इतिहास दोहराता है ...

मेरे एक सहयोगी रविप्रकाश थे। छोटा सा सुखी परिवार था। एक तीन वर्ष का बेटा और एक चार महीने की बिटिया। पत्नी ठेठ ग्रामीण परिवेश से थी किन्तु बारहवीं तक पढ़ी थी और घरेलू कामकाज में कुशल थीं। वे कार्यालय में लिपिक के पद पर थे। संस्था का काला-सफेद जानते थे। आर्थिक विपन्नता नहीं थी किन्तु ऐसा भी नहीं था कि ऐशोआराम के साधन में से कोई एक ही ले पाते। हँसमुख थे और परोपकारी तो परम के थे। रुपयों से सहायता करने में सक्षम नहीं थे इसलिए परिश्रम दान करते। संस्था में कुछ बड़ा आयोजन होने वाला था। एक्स्ट्रा ड्यूटी सभी को करनी पड़ रही थी। कई बार घर पहुँचने में ग्यारह भी बज जाते। शनिवार को तय हुआ कि कल इतवार को दोपहर दो बजे से आयेंगें। अगले दिन हम लोग दो बजे पहुँचे तो देखा बड़ी अफरा-तफरी मची है। पता चला रविप्रकाश जी घर पहुँचे ही नहीं। सुबह से सब जगह उन्हें तलाशा जा रहा है। उनकी पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल था। उन्हें पुलिस ने भी बहुत तलाशा किन्तु कोई पता नहीं चला। मोबाइल उन दिनों होते नहीं थे। उनके गायब होने की कोई वज़ह किसी को नहीं पता। हैरान हैं सब। वक़्त गुज़रता गया। उनकी पत्नी को संस्था ने बीटीसी करवाया। बाद में ...

रानो और रफ़ीक

नवाब मिर्ज़ा और दादा जी में दांत काटी दोस्ती थी। बहस भी खूब होती पर एक दूसरे की उठती गिरती पलक का हाल बिन कहे दोनों ही समझ जाते। बेगम साहिब बड़ी नफ़ासत पसंद तबियत की मल्लिका थीं। दादी से उनकी दोस्ती बहनापे की थी। दुपहरी एक दूसरे के घर कटती थी दोनों की। एक से बढ़कर एक क्रोशिया की कारीगरी होती। थालपोश , मेज़पोश, शृंगार मेज के कवर, कोस्टर कवर , ख़ूबसूरत लेस बुनी जातीं। भरवाँ कढ़ाई के बूटे काढ़े जाते। धागों के रंगों की मैचिंग का हंगामा अलग ही लुत्फ़ देता था। चिप्स, पापड़, कचरी, मूँगौड़ी, वड़ी सब इसी दुपहरी में बनता। कारख़ाना खुल जाता और बोरा भर आलू दो दिन में तमाम हो जाता। नवाब मिर्ज़ा और बेगम साहिबा की दरगाहों पर मन्नतों की दुआ से एक बेटा था जिन्हें रफ़ीक नाम से नवाज़ा गया था। माशाअल्लाह ख़ूबसूरत, लंबे, गोरे चिट्टे , ज़हीन इंसान थे। हम उन्हें रफ़ीक चचा कहते और अक्सर अपनी उजड्डता के लिए टिपियाये जाते। हमारी मंझली बुआ उनकी हमउम्र थीं। बचपन से साथ खड़िया पट्टी लेकर पंडित जी पाठशाला में ककहरा सीखने जाते। उनका बड़ा रौब हुआ करता था। बुआ पर हुकूम खूब चलाते। बेचारी रानो बुआ उनके खफ़ा हो जाने से बड़ा खौफ़ खाती थीं। कक्षा...