भूत लीला
बचपन में भूत के नाम से मैं डर के मारे बेवक्त सो जाती थी।
फिर कॉलेज के हॉस्टल में रह कर वह डर अपने आप गायब हो गया।
हम रोवर से फ्रैंकी मँगवाते और उससे टॉर्च को तीन बार जलाने-बुझाने का सिग्नल बाउंड्री वाल के गेट नम्बर दो की झिर्री से देने को कहते। चार लड़कियाँ बरामदे में वॉक करने के बहाने टहलते रहते। बाउंड्री के आखिरी कोने में अँधेरा रहता था और वह कोना सिस्टर की नज़र में भी नहीं आता था, यह बात हमें मालूम थी। सिग्नल आने पर कोई एक लड़की दबे पांव जाती और पैकेट ले आती। दीवार में एक छेद था जिससे हाथ आराम से आरपार चला जाता और पैकेट भी मजे में निकल आता। रोवर का बन्दा उसी कोने से हमें पैकेट पकड़ाता और पेमेंट ले जाता। वैसे हम लोग रोवर में एकाउंट भी सेट किये हुए थे कि जब पैसे की तंगी होगी तो पेमेंट नहीं देंगें, पाँच तारीख के बाद आकर एक साथ हिसाब चुकता करेंगें।
काफी समय तक सब अच्छी तरह चलता रहा। एक रात पैकेट आने में देर हो गयी। सर्दी इतनी कि हड्डियाँ गल रही थीं। इंतज़ार लंबा था। ग्यारह बज गए थे। कुछ गुस्सा भी था कि ठंड से मरे जा रहे हैं और ऊपर से भूखे भी रहना पड़ेगा। फ्रैंकी की भूख लगती भी तो बहुत तेज थी। उस दिन हम तीन टहल रहे थे फिर एक वापस लौट गई क्योंकि ठंड से उनके सिर में दर्द शुरू हो गया था। रोवर का बन्दा आ कर ही नहीं दे रहा था। हमने तय किया साढ़े ग्यारह बजे हम रूम में चले जायेंगें।
ग्यारह बजकर बीस मिनट पर सिग्नल हुआ। दूसरी लड़की ने टोपी नहीं पहनी थी इसलिए मुझे पैकेट लेने जाना था। मैं गयी। पैकेट लिया और पलटी तो सामने कोई खड़ा था जिसकी आँखें हरी थीं .... अल्लाह !!!!!!!!!! लाख याद करने की कोशिश की हनुमान जी का नाम तक याद नहीं आया चालीसा की कौन कहे। ये गनीमत थी कि फ्रैंकी के पैकेट को शॉपिग बैग में रख चुकी थी। पैर हजारों किलो के हो गए थे, सरक ही नहीं रहे थे। लगे वोमिट करने लगूँगी। अम्माँ डैडी को आखिरी बार देखने की इच्छा बढ़ती ही जाये। वो हरी आँखें मुझसे नज़र हटा ही नहीं रही थीं। न जाने कैसे मैं दो कदम आगे बढ़ी। मुझे चलता देख वो आँखे ऐसी दिखने लगीं मानो वे हँस रही हों। अब मुझे उसका लाल मुँह भी दिखने लगा। लगने लगा कि आज तो ये हरी आँख वाला मेरा कपाल फाड़ ही देगा। मैं किसी तरह बरामदे की ओर चलती रही। मैं तो मरने वाली थी पर फ्रैंकी तो सबको दे देती बस यही लगने लगा था सो उसकी हिफाजत भी किये जा रही थी। जल तू जलाल तू वाला मन्त्र भी याद नहीं आया।
मैं लगभग बरामदे के निकट पहुँच चुकी थी अचानक उसने मेरे कंधे पर हाथ रख दिया .....
उसके बाद क्या हुआ मुझे नहीं पता। जब होश आया तो पता चला दोपहर का तीन बजा है और मैं नर्सिंग सिस्टर के वार्ड में हूँ जो हॉस्टल के साथ ही जुड़ा था।
मेरी सहेलियाँ मानने को तैयार ही नहीं थीं कि वहाँ कोई था क्योंकि दूसरी लड़की जो मेरे साथ टहल रही थी उसने कुछ नहीं देखा था सिवाय मेरे बेहोश होकर गिरने के। सिस्टर से कहा नहीं जा सकता था क्योंकि वार्डन तक बात पहुँची और हम सबको निकाल बाहर किया जाता।
एक सप्ताह बाद मैंने तय किया कि मैं फिर से रात में उसी जगह जाऊँगी जिससे पता तो चले क्या था वो।
शनिवार रात को तय हुआ कि रोवर से फ्रैंकी मंगवाई जाये। फ्रैंकी आई और मैं गयी पैकेट लेने। इस बार मेरे पैकेट ले कर पलटने पर कोई नहीं था। मैं चल पड़ी। अचानक मेरा कोट किसी ने पीछे से खींचा। मैं जितना भी जोर से चिल्ला सकती थी चिल्लाई " भूत "
और दौड़ने लगी। भूत मुझे पीछे से खींचकर रोकने की कोशिश करने लगा। मैं बरामदे तक पहुँचते ही गिर गयी किन्तु बेहोश होने से पहले भूत की शक्ल देख ली।
जब होश आया तो उस भूत की शक्ल याद आई। सहेलियाँ कहने लगीं कि फ्रैंकी मंगवाना बन्द कर देते हैं क्योंकि भूत तुम्हें पहचान गया है। यह सुनकर मुझे तेज बुखार चढ़ आया।
तीन दिन बाद जब कुछ ठीक हुई तो एक लड़की मुझे देखने आई और रोने लगी कि, " प्लीज वार्डन को नहीं बताना , वो मेरा बॉय फ्रेंड था। जब वो आता था तभी तुम आ जाती थी इसलिए तुम्हें डरा कर वहाँ आने से रोकने के लिए ऐसा किया।"
पर /किन्तु/परन्तु ....
अगर सचमुच का भूत देखना हो तो रात को किसी अस्पताल के सूनसान कॉरिडोर में जब लाइट डिम कर दी जाती हैं उसके बाद जाकर टहल कर अनुभव कीजिये।
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